पीएम के लिए चैलेंज: राहुल को अपनी इमेज बदलनी होगी, लेकिन कैसे?

By - Jun 14, 2018 10:30 AM
पीएम के लिए चैलेंज: राहुल को अपनी इमेज बदलनी होगी, लेकिन कैसे?

राहुल गांधी देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष हैं. पढ़े-लिखे हैं. देश के सबसे मशहूर राजनीतिक घराने से नाता रखते हैं. भारत के कोने-कोने में घूमते हैं. समर्थकों की भीड़ में जाकर उनसे मिलते हैं. व्यक्तित्व शालीन है. सार्वजनिक जीवन में मर्यादाओं का ध्यान रखते हैं और निजी हमलों का जवाब ना देने की बात बार-बार दोहराते हैं. लेकिन इतना सब होने के बावजूद वे `पप्पू’ हैं.

अपनी इमेज के साथ राहुल गांधी की जंग लगातार जारी है. इस जंग में वे कई बार मजबूती से डटे हुए नज़र आते हैं. लेकिन बार-बार पिटते भी दिखाई देते हैं. सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और बीजेपी के मीडिया सेल का व्यवस्थित कैंपेन अपनी जगह है. लेकिन अगर इन्हे हटा दें तब भी भारत के वोटरों को एक बड़ा तबका राहुल गांधी को विश्वसनीयत नहीं मानता है. उनकी छवि एक ऐसे राजनेता की है, जो गलती से राजनीति में आया या लाया गया. उसके पास अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है. वह चुनाव के दौरान प्रकट होता है, भाषण देता है और चुनाव के बाद लंबे समय के लिए कहीं गायब हो जाता है.

मोटे तौर पर देखें तो राहुल गांधी की दो बड़ी समस्याएं नज़र आती हैं. कंसिस्टेंसी और कम्युनिकेशन. कंसिस्टेंसी का मतलब निरंतर सक्रियता से है. 2014 के चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी एक तरह से परिदृश्य से गायब हो गए. कायदे से उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करना चाहिए था. लेकिन उनकी जगह मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया गया.

शुरुआती तीन साल में राहुल केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर उसे घेरने में पूरी तरह नाकाम रहे बल्कि यह कहना चाहिए कि इसकी कोशिश करते भी नज़र नहीं आए. लेकिन यूपी चुनाव के बाद से स्थिति बदलनी शुरू हुई और गुजरात के आते-आते राहुल ने बता दिया कि उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं है और वे कांग्रेस को फ्रंट से लीड करने को तैयार हैं. लंबी छुट्टियां लेने वाले नेता की अपनी छवि तोड़ने के लिए उन्होने बताना शुरू किया कि वे विदेशी दौरे पर किसलिए और कितने वक्त के लिए जा रहे हैं. अपनी मां सोनिया गांधी के मेडिकल चेकअप के लिए जाते वक्त भी राहुल ने ट्वीट किया था.

कम्युनिकेटर के तौर पर नाकाम हो रहे राहुल

गुजरात से लेकर कर्नाटक तक के चुनावी सफर में राहुल गांधी ने कंसिस्टेंसी से जुड़े सवालों का जवाब बखूबी दे दिया है. लेकिन बतौर कम्युनिकेटर उनकी समस्याएं बरकार हैं. गुजरात के कैंपेन के दौरान `शाह जादा खा गया’ और जीएसटी यानी `गब्बर सिंह टैक्स’ जैसे उनके वन लाइनर खूब हिट हुए थे. ऐसे में कई लोगों को लगा था कि राजनीति में दशक भर से ज्यादा समय की सक्रियता ने राहुल गांधी में आत्मविश्वास भर दिया है और अब उन्हें बोलना आ गया है. ट्विटर पर भी राहुल गांधी के फॉलोअर तेजी से बढ़े और दावा किया गया कि वे अपने ट्वीट्स खुद लिखते हैं. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता बदलती इमेज के बीच अपनी रैलियों में राहुल लगातार कुछ ना कुछ ऐसा बोलते रहे, जिसे लेकर उनका मजाक उड़ा.